केलाड़ी की रानी चेन्नम्मा - १
छत्रपति शिवाजी के पुत्र की रक्षा करने वाली केलाड़ी की रानी चेन्नम्मा एक सशक्त, निर्भीक और कुशल शासिका थी। उन्होंने दक्षिण भारत के केलाड़ी पर 25 सालों तक राज किया।
चेन्नम्मा की विवाह
राजा सोमशेखर की काफी अधिक उम्र हो चुकी थी, फिर भी उन्होंने विवाह नहीं किया था। राजा की धर्म में अधिक रुचि थी,जिससे सभी को डर था कि उनके राजा संन्यास ग्रहण ना कर ले।
लेकिन एक बार राजा रामेश्वर ने कोटपुरा के मेले में पहली बार चेन्नम्मा को देखा। चेन्नम्मा के पिता का नाम सिदप्पा शेट्टी था।
राजा चेन्नम्मा के रूप और गुण से बहुत प्रभाविक हुये। राजा ने मन में उनसे विवाह करने की ठान ली और अपने महामंत्री को विवाह का प्रस्ताव लेकर चेन्नम्मा के पिता के पास भेजा। उनकी स्वीकृति के बाद दोनों का विवाह हो गया।
केलाड़ी राज्य के राजा
केलाड़ी राज्य कर्नाटक के मालनद में स्थित था। इसके प्रथम शासक चौड़प्पा नायक थे, जिन्होंने सन् 1500 में वहाँ का कार्यभार संभाला।
चौड़प्पा नायक के बाद 1645 में शिवप्पा नायक केलाड़ी के राजा बने,फिर 1664 में शिवप्पा नायक का छोटा पुत्र सोमशेखर नायक राजा बना। उस समय केलाड़ी का राज्य गोवा से लेकर मलाबार तक फैला हुआ था।
राजनर्तकी कलावती
विजयनगर साम्राज्य के समय में दशहरा राजकीय उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता था।
इसमें भाग लेने के लिए देश के कोने - कोने से कलाकार केलाड़ी में आते थे। नृत्य और संगीत के कार्यक्रमों के बाद राजा इन्हें बहुमूल्य उपहार देते थे।
एक बार जंबू खंड की प्रसिद्ध नर्तकी कलावती ने राजा और रानी के सामने नृत्य प्रस्तुत किया।
इससे खुश होकर राजा ने उसे बहुत सारा धन, आभूषण उपहार में दिया और उसे राज नर्तकी घोषित कर दिया।
कलावती की माँ और उनके पालक पिता भी उनके साथ रहते थे। कलावती के पिता जादू और अनेक जड़ी बूटियों के जानकार थे।
उस समय रानी चेन्नम्मा की कोई संतान न थी, इस बात का फायदा उठा कर कलावती के पिता ने राजा से घनिष्ठता बढ़ा ली।
धीरे- धीरे राजा ने कलावती के साथ राजमहल से दूर रहना शुरु कर दिया। इस अवसर का लाभ उठा कर कलावती के पिता ने राजा पर अपने जादू और जड़ी बूटियों का प्रयोग करना शुरु कर दिया।
उसके प्रभाव के कारण राजा सोमशेखर अर्धविक्षिप्त हो गये। धीरे- धीरे उन्हें कई तरह के रोगों ने घेर लिया,जिससे बड़े- बड़े अधिकारियों और मंत्रियों तक को सलाह मशवरे के लिए नर्तकी के घर जाना पड़ता था।
केलाड़ी पर हमला
राजा का ऐसे हाल से रानी बहुत दुखी रहती थी। राजा के बुरे स्वास्थ की खबर पूरे राज्य में फैल गई, सभी को चिंता होने लगी कि राजा निसंतान हैं और उनके बाद गद्दी पर कौन बैठेगा।
इस अवसर का फायदा उठाकर बीजापुर के सुल्तान, जिसे केलाड़ी ने कई बार हराया था। केलाड़ी पर हमला कर दिया।
रानी चेन्नम्मा इस विपत्ति की घड़ी से अपने राज्य को बचाने के लिए उस नर्तकी के घर गयी और राजा से मिली।
रानी चेन्नम्मा ने राजा से कहा कि आप राजमहल चलिये वहाँ राजवैद्य आपको ठीक कर देंगे।
हमें अपनी राज्य की रक्षा करनी चाहिए, हम किसी बालक को गोद ले लेंगे, लेकिन राजा के ऊपर कलावती के पिता का जादू के प्रभाव के कारण उन्होंने रानी की किसी भी बात पर ध्यान नहीं दिया।
रानी को अकेले ही वहाँ से लौटना आयी। रानी राज्य की रक्षा के लिए अपने पिता और कुछ विश्वशनीय सेना नायकों की मदद से राज्य भार उठाने का निर्णय लिया।
उत्तराधिकारी की जंग
एक दिन महामंत्री थिमन्ना नायक, कृष्णप्पा को साथ लेकर रानी के पास गये और रानी के मुख्य सेनापति भदरप्पा नायक के पुत्र वीरभद्र नायक को अपने पुत्र के रूप में गोद लेने को कहा और धमकी दी कि यदि आप ऐसा नहीं करेंगी तो हम आपका साथ नहीं देंगे,सारी प्रजा की आपके विरुद्ध करके वीरभद्र को राजा बना देंगे।
इसी प्रकार की धमकियां रानी को कुछ अन्य मंत्रियों ने भी दी। इसी अवसर का लाभ उठा कर बीजापुर के सुल्तान ने जन्नो पंत को रानी के बात करने को भेजा।
जन्नो पंत के ठीक पीछे सुल्तान ने मुजफ्फर खान को अपनी सेना के साथ भी केलाड़ी के लिए रवाना कर दिया। रानी को इन सभी बातों की जानकारी पहले ही अपने गुप्तचरों से मिल चुकी थी।
रानी को प्रजा का साथ
रानी इस समय युद्ध लड़ने की स्थिति में नहीं थी, इसलिए उन्होंने जन्नो पंत को 3 लाख देकर सुल्तान से संधि कर ली। लेकिन सुल्तान ने अपनी फौज को वापस नहीं बुलाया।
तब रानी ने अपनी प्रजा को संबोधित किया और युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया।रानी ने राजकोष के सभी जेवरात अपनी प्रजा में बांट दिये।
कलावती और उसके पिता दुश्मन से मिलना
जन्नो पंत रानी से मिलने के बाद कलावती और उसके पिता के पास पहुँचा। उसने उन्हें लालच देकर राजा सोमशेखर की हत्या करवा दी।
जब तक रानी को सोमशेखर की मृत्यु का पता चला तब तक बीजापुर की सेना बिदनूर के किले पर अपना कब्जा जमा चुकी थी।
कलावती के पिता ने सुल्तान का भरपूर साथ दिया। सुल्तान की सेना बहुत विशाल थी इसलिए सिदप्पा शेट्टी ने रानी को बिदनूर छोड़कर कहीं और जाने की सलाह दी। रानी चेन्नम्मा के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
राजसिंहासन, राजकीय धन और अन्य मूल्यवान वस्तुओं को भुवनगिरि के किले में स्थानांतरित कर दिया गया।
जब सुल्तान की सेना किले के अंदर पहुँची उससे पहले ही रानी अपने सभी मुख्य सरदार और सैनिकों के साथ भुवनगिरि के किले में सुरक्षित पहुँच चुकी थी।
बिदनूर पर रानी का कब्जा
सुल्तान के आक्रमण के बाद परिस्थितियों को देखकर थिमन्ना नायक रानी के पास वापस आ गये और क्षमा माँगने लगे। रानी ने भी उन्हें उनका पद वापस दे दिया।
थिमन्ना नायक ने सभी सरदारों को और सैनिकों को एकजुट करके एक सेना तैयार की। फिर वे बिदनूर की ओर बढ़ चले।
सुल्तान की सेना भी भुवनगिरी बढ़ी आ रही थी। घने जंगल में एक संकीर्ण रास्ते में रानी के सैनिकों ने सुल्तान के सैनिकों को घेर लिया।
दोनों में युद्ध हुआ और सुल्तान के सैनिकों की हार हुई,बिदनूर फिर से रानी के कब्जे में आ गया।
रानी का राज्याभिषेक और राजनर्तकी को मृत्युदंड
इसके बाद 1671 में भुवनगिरी के किले में रानी का विधिवत राज्याभिषेक किया गया।
राज्याभिषेक के बाद रानी ने अपनी फैसलों से अपनी प्रजा को खुशियां बहाल की और अपने पति के हत्यारों, कलावती के पिता और जन्नो पंत को गिरफ्तार कर लिया और मौत की सजा सुनाई।
मैसूर से रानी का युद्ध
विपरीत परिस्थितियों में राज्य को हड़पने की कोशिश करने वालों को राज्य से बाहर निकाल दिया।
रानी के ही शासन काल में केलाड़ी राजवंश के ही एक अंधक वेंकट नायक ने मैसूर के राजा से मिलकर युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।
जब मैसूर के राजा ने युद्ध की घोषणा की तब रानी ने भदरप्पा नायक के नेतृत्व में सेना शत्रु से लड़ने के लिए भेज दी।
ठीक उसी समय सोडे, सिरसी, बनवासी सरदारों ने रानी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी लेकिन रानी ने अपने साहस से दोनों युद्धों में जीत हासिल की।
अगले वर्ष मैसूर ने फिर से आक्रमण कर दिया,लेकिन रानी ने उन्हें पराजित करके उनके कई सरदारों को बंदी बना लिया, फिर कुछ समय पश्चात उन्हें छोड़ दिया जिससे खुश होकर मैसूर ने रानी से संधि कर ली।

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