द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को महाभारत युद्ध में कौन सा कवच दिया था ?

महाभारत युद्ध के दौरान जब दुर्योधन ने यह देखा कि अर्जुन, भीम और पांडव पक्ष के अन्य योद्धाओं के प्रहार को कौरव पक्ष की सेना सहन नहीं कर पा रही है। 



तब पांडवों से पराजित होने के डर से वह द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म से इनका कुछ उपाय निकलने का निवेदन करने उनके पास पहुँचे।

तब द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा कि वास्तव में अर्जुन अजेय है,लेकिन उन्होंने दुर्योधन को ऐसा उपाय बताया जिससे वे युद्ध भी करे और उसे कोई हानि ना पहुँचे। 

द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को एक स्वर्ण कवच पहनने को दिया और कहा जब तक ये तुम्हारे शरीर पर रहेगा, इस पर किसी भी अस्त्र का प्रभाव नहीं हो पाएगा।

द्रोणाचार्य ने मंत्रों द्वारा एक शदभुत कवच दुर्योधन को दिया। 


किसका था यह कवच 

द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को बताया कि इंद्र ने जब वृत्रासुर पर आक्रमण किया था तो वह इसी कवच को पहनकर वृत्रासुर के प्रहारों से सुरक्षित रहे थे।

इंद्र को यह कवच शिव जी से प्राप्त हुआ था। इंद्र ने यह कवच अंगिरा ऋषि को दिया ,अंगिरा ऋषि ने पुत्र बृहस्पति को,बृहस्पति ने अग्निवेश्य को और अग्निवेश्य ने यह कवच मुझे दिया है। इसको विधि पूर्वक अभिमंत्रित करके मैने तुझे ग्रहण कराया है। 

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