बाण शय्या पर भीष्म को ,किस दिव्यास्त्र से अर्जुन ने पानी पिलाया ?
महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाण लगने के बाद भीष्म पितामह बाण शय्या पर लेटे हुए,योगबल से उत्तरायण की प्रतिक्षा कर रहे थे।
बाणों से उनके सारे शरीर में भयंकर जलन हो रही थी जिससे वे थोड़ी - थोड़ी देर के बाद मूर्छित हो रहे थे।
उनके चारों ओर कौरव, पांडव और दोनों पक्षों के गणमान्य राजागण खड़े थे। सभी को देखकर भीष्म ने उनसे जल पिलाने को कहा।
यह सुनते ही कौरव और पांडव दोनों पक्षों के खड़े व्यक्ति जल और विभिन्न प्रकार के भोजन लाने को दौड़े।
भीष्म बाण शय्या से उठकर जल पीने और भोजन ग्रहण करने की स्थिति में नहीं थे।
इसलिए उन्होंने दोनों पक्षों के लोगों से कहा कि जिन पदार्थों को मैं जीवन भर ग्रहण करता रहा उन्हें अब मैं नहीं भोग सकता,मैं तो अब मृत्युलोक से बाहर शर शय्या पर शयन कर रहा हूं और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा कर रहा हूं।
कुछ देर बाद भीष्म ने अर्जुन को बुलाकर कहा कि तुम्हारे बाणों ने मेरे शरीर को बहुत घायल कर दिया है जिससे मर्म स्थलों में तीव्र पीड़ा और जलन हो रही है।
मेरा मुँह सुख रहा है और प्यास लग रहा है। तुम मुझे जल पीला दो। तब अर्जुन ने पार्जन्यास्त्र बाण को धनुष पर रखकर पितामह के दाएं ओर पृथ्वी में छोड़ दिया।
वह बाण पृथ्वी में धंसा और उसी स्थान से जल की धारा निकल कर भीष्म पितामह के मुख में आने लगी और उनकी प्यास बुझी।
इसके बाद भीष्म ने दुर्योधन को समझाया कि पाशुपत, ब्राह्म, प्रजापत्य, आग्नेय, वारुण, वैष्णव, ऐन्द्र, वायव्ये , सविता, त्वष्टा और विधाता नाम मंत्र से चलने वाले सभी अस्त्र जो अर्जुन और श्री कृष्ण के पास हैं, वो और किसी योद्धा के पास नहीं है।
उत्तरायण में मृत्यु से क्या होता है ?
हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि दक्षिणायन में प्राण छोड़ने वाला व्यक्ति अधोगति को प्राप्त होता है और उत्तरायण के समय प्राण त्यागने वाला व्यक्ति ऊर्ध्व लोकों में गमन करता है जिस समय भीष्म बाण शय्या पर पड़े थे, वह दक्षिणायन थे। इन्हीं मान्यताओं के कारण भीष्म पितामह 58 दिन बाण शय्या पर लेटे रहे। वह अपने प्राणों को उत्तरायण के आने तक नियंत्रित किए हुए थे।

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