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Showing posts from December, 2025

राजा बलि को यज्ञ से कौन से अस्त्र मिले ?

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🔱राजा बलि ने विश्व विजय के लिए शुक्राचार्य आदि भृगुवंशीय ब्राह्मणों को एक महान यज्ञ के संपादन के लिए निमंत्रित किया।  🔱राजा बलि को विश्व विजय प्राप्त करना था,ब्राह्मणों को जब यह पता चला तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए।  🔱विधि विधान से महाभिषेक किया गया और विश्वजीत यज्ञ विधि से होने लगा। जब पर्याप्त संख्या में आहुतियाँ दी जा चुकी थी,तो सभी उपस्थित जनों को आश्चर्य हुआ। 🔱यज्ञ कुंड में से सोने के पट से बांधा हुआ था,एक रथ इंद्र के घोड़ों की तरह,हरे रंग के घोड़े और एक ध्वजा जिस पर सिंह का चित्र अंकित था। 🔱इनके अतिरिक्त एक दिव्य धनुष जो सोने के बंधों से बंधा हुआ था,अक्षय बाणों से भरपूर दो तुण और दिव्य कवच भी उसके साथ थे।  🔱जब बलि को भगवान से यज्ञ की सफलता के परिणाम स्वरूप यह वस्तुएँ प्राप्त हुई तो बलि के पितामह भक्त प्रह्लाद ने आरंभिक सफलता के खुशी में एक ऐसी माला भेंट की जिसके पुष्प कभी मुरझाते नहीं थे।  🔱दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए एक शंख दिया।  🔱जब बलि को यह आश्वासन हो गया कि यज्ञ भगवान कृपा से अब वह अपार शक्तियों से सुसज्जित हैं तो उसक...

बाण शय्या पर भीष्म को ,किस दिव्यास्त्र से अर्जुन ने पानी पिलाया ?

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महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाण लगने के बाद भीष्म पितामह बाण शय्या पर लेटे हुए,योगबल से उत्तरायण की प्रतिक्षा कर रहे थे।  बाणों से उनके सारे शरीर में भयंकर जलन हो रही थी जिससे वे थोड़ी - थोड़ी देर के बाद मूर्छित हो रहे थे। उनके चारों ओर कौरव, पांडव और दोनों पक्षों के गणमान्य राजागण खड़े थे। सभी को देखकर भीष्म ने उनसे जल पिलाने को कहा। यह सुनते ही कौरव और पांडव दोनों पक्षों के खड़े व्यक्ति जल और विभिन्न प्रकार के भोजन लाने को दौड़े। भीष्म बाण शय्या से उठकर जल पीने और भोजन ग्रहण करने की स्थिति में नहीं थे। इसलिए उन्होंने दोनों पक्षों के लोगों से कहा कि जिन पदार्थों को मैं जीवन भर ग्रहण करता रहा उन्हें अब मैं नहीं भोग सकता,मैं तो अब मृत्युलोक से बाहर शर शय्या पर शयन कर रहा हूं और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा कर रहा हूं।  कुछ देर बाद भीष्म ने अर्जुन को बुलाकर कहा कि तुम्हारे बाणों ने मेरे शरीर को बहुत घायल कर दिया है जिससे मर्म स्थलों में तीव्र पीड़ा और जलन हो रही है। मेरा मुँह सुख रहा है और प्यास लग रहा है। तुम मुझे जल पीला दो। तब अर्जुन ने पार्जन्यास्त्र बाण को धनुष पर रख...

द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को महाभारत युद्ध में कौन सा कवच दिया था ?

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महाभारत युद्ध के दौरान जब दुर्योधन ने यह देखा कि अर्जुन, भीम और पांडव पक्ष के अन्य योद्धाओं के प्रहार को कौरव पक्ष की सेना सहन नहीं कर पा रही है।  तब पांडवों से पराजित होने के डर से वह द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म से इनका कुछ उपाय निकलने का निवेदन करने उनके पास पहुँचे। तब द्रोणाचार्य ने दुर्योधन से कहा कि वास्तव में अर्जुन अजेय है,लेकिन उन्होंने दुर्योधन को ऐसा उपाय बताया जिससे वे युद्ध भी करे और उसे कोई हानि ना पहुँचे।  द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को एक स्वर्ण कवच पहनने को दिया और कहा जब तक ये तुम्हारे शरीर पर रहेगा, इस पर किसी भी अस्त्र का प्रभाव नहीं हो पाएगा। द्रोणाचार्य ने मंत्रों द्वारा एक शदभुत कवच दुर्योधन को दिया।  किसका था यह कवच  द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को बताया कि इंद्र ने जब वृत्रासुर पर आक्रमण किया था तो वह इसी कवच को पहनकर वृत्रासुर के प्रहारों से सुरक्षित रहे थे। इंद्र को यह कवच शिव जी से प्राप्त हुआ था। इंद्र ने यह कवच अंगिरा ऋषि को दिया ,अंगिरा ऋषि ने पुत्र बृहस्पति को,बृहस्पति ने अग्निवेश्य को और अग्निवेश्य ने यह कवच मुझे दिया है। इसको विधि पूर्वक अभ...

प्राचीन काल में यज्ञ द्वारा प्राप्त संताने कौन है ? - २

💠 जमदग्नि ऋषि और विश्वामित्र चंद्रवंशीय राजा गाधि की पुत्री का नाम सत्यवती था। उनका विवाह भृगु ऋषि के पुत्र ऋचीक से हुआ था। ऋचीक ने संतान की कामना से सत्यवती के लिए चरु (यज्ञीय खीर) तैयार किया और पुत्र की उत्पत्ति के लिए चरु सत्यवती की माता के लिए भी बनाया।  फिर अपनी पत्नी से बताया कि यह चरु तुम्हारे लिए है और यह तुम्हारी माता के लिए इसका सही प्रकार से उपयोग करना। ऐसा कहकर वे वन चले गए। उनके जाने के बाद सत्यवती की माता ने कहा कि तू अपना चरु मुझे दे दे और मेरा तू ले ले, सत्यवती ने ऐसा ही किया। वन से वापस लौटने पर ऋषि को पता चला कि सत्यवती ने अपना चरु अपनी माँ को दे दिया।  तब ऋचीक ऋषि ने क्रोधित होकर अपनी पत्नी से कहा कि मैंने माता के चरु में संपूर्ण ऐश्वर्य, पराक्रम, शूरता और बल की संपत्ति का आरोपण किया था और तुम्हारे चरु में शांति, ज्ञान, तितिक्षा आदि संपूर्ण ब्राह्मणोचित गुणों का समावेश किया था। इसके बाद सत्यवती ने जमदग्नि को जन्म दिया और उनकी माता ने विश्वामित्र को। जमदग्नि ने इक्ष्वाकु कुल रेणू की कन्या रेणुका से विवाह किया, जिससे परशुराम जी का जन्म हुआ। जो भगवान नारायण के...

केलाड़ी की रानी चेन्नम्मा - १

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छत्रपति शिवाजी के पुत्र की रक्षा करने वाली केलाड़ी की  रानी चेन्नम्मा एक सशक्त, निर्भीक और कुशल शासिका थी। उन्होंने दक्षिण भारत के केलाड़ी पर 25 सालों तक राज किया।  चेन्नम्मा की विवाह राजा सोमशेखर की काफी अधिक उम्र हो चुकी थी, फिर भी उन्होंने विवाह नहीं किया था। राजा की धर्म में अधिक रुचि थी,जिससे सभी को डर था कि उनके राजा संन्यास ग्रहण ना कर ले। लेकिन एक बार राजा रामेश्वर ने कोटपुरा के मेले में पहली बार चेन्नम्मा को देखा। चेन्नम्मा के पिता का नाम सिदप्पा शेट्टी था।  राजा चेन्नम्मा के रूप और गुण से बहुत प्रभाविक हुये। राजा ने मन में उनसे विवाह करने की ठान ली और अपने महामंत्री को विवाह का प्रस्ताव लेकर चेन्नम्मा के पिता के पास भेजा। उनकी स्वीकृति के बाद दोनों का विवाह हो गया। केलाड़ी राज्य के राजा   केलाड़ी राज्य कर्नाटक के मालनद में स्थित था। इसके प्रथम शासक चौड़प्पा नायक थे, जिन्होंने सन् 1500 में वहाँ का कार्यभार संभाला। चौड़प्पा नायक के बाद 1645 में शिवप्पा नायक केलाड़ी के राजा बने,फिर 1664 में शिवप्पा नायक का छोटा पुत्र सोमशेखर नायक राजा बना। उस समय केलाड़ी का राज...

केलाड़ी की रानी चेन्नम्मा - २

छत्रपति शिवाजी के पुत्र को रानी का संरक्षण  रानी अपने दरबार के कामों को पूर्ण करने के बाद गरीबों और साधु संन्यासियों को दान देती थी। एक दिन रानी जब दान दे रही थी तब चार सन्यासी वहाँ आये और चुपचाप खड़े हो गये। फिर उनमें से एक ने बताया कि मैं संभाजी का भाई राजाराम हूँ ,मेरे भाई संभाजी को औरंगज़ेब ने मरवा दिया है और मुझे, मारने के लिए एक बड़ी सेना भेजी है। जिसने मेरे कई किलो पर कब्जा कर लिया है।  मुझे मरवा देने के बाद वह पूरे महाराष्ट्र पर कब्जा कर लेगा। मैं किसी तरह छिपकर आपके पास आया हूँ। मैने कई राजाओं से शरण माँगी, लेकिन औरंगज़ेब के डर से किसी ने मेरी मदद नहीं की। रानी ने उनसे कहा कि मैं आपकी हर संभव मदद करुंगी। जब औरंगज़ेब को यह पता चला तब उसने अपने बेटे अजमथ आरा को एक बड़ी सेना के साथ केलाड़ी पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। लेकिन तब तक राजाराम को सुरक्षित जिंजी के किले में पहुंचा दिया गया था।  औरंगज़ेब ने रानी को एक पत्र भेजा जिसमें लिखा था कि राजाराम को हमे सौंप दें नहीं तो मुगल सेना का सामना करना पड़ेगा।  इसके जवाब में रानी ने पत्र भेजा जिसमें लिखा था कि राजाराम...

बेगम हजरत महल

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(1820 - 1879) नवाब वाजिद अली शाह की 36 वीं बेगम  प्रारंभिक जीवन इनका जन्म 1820 में अवध प्रांत के फैजाबाद जिले के एक छोटे से गांव में बेहद गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में इन्हें मुहम्मद खातून (मुहम्मद खानम) या उमराव कहते थे। पिता मजरुद्दीन थे,जो फर्रुखाबाद के नवाब गुलाम हुसैन के सेनापति और इनकी मां महर अफसा नेपालशाही सेना के सेमापति की बेटी थी। इनके माता - पिता का देहांत चेचक के कारण हो गया था। इसके बाद इनकी बुआ ने इन्हें बेच दिया था।  विवाह   इनका विवाह वाजिद अली शाह से हुआ था।  शादी के बाद इन्हें नवाब ने महक परी बेगम की पदवी दी गई।  1846 में बेटे के जन्म के बाद इन्हें  इत्तेखार उल्लीसा बेगम  की पदवी और  बेगम हजरत महल  का नाम भी वाजिद अली ने दिया।  रमजान में पैदा होने के कारण इनके बेटे को रमजान कहा गया, लेकिन वाजिद अली ने अपने बेटे का नाम मिर्जा बिरजिसकद्र रखा।  बेगम की महिला सैनिक दल बेगम हजरत महल के सैनिक दल में कई महिलाएं भी शामिल थी जिसका नेतृत्व रहीमी बी करती थी। इनका साथ देने वाली अन्य विरांगाएं रनवीरी वाल्मीकि, सहेजा वाल्मीक...

पार्वती गिरी (1926 - 1995)

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  जिन्हें उड़ीसा की मदर टेरेसा भी कहा जाता था।  प्रारंभिक जीवन  इनका जन्म 19 जनवरी,1926 को ओडिशा के संबलपुर जिले के " समवाईपदार गांव"  में हुआ था।  इनके पिता धनंजय गिरी गांव के प्रमुख और उनके चाचा कांग्रेस के नेता थे। इस कारण स्वतंत्रता सेनानी उनके घर अक्सर आते थे। इसी कारण उनके अंदर भारत को आजादी दिलाने की बात छोटी सी उम्र में ही, उनके मन में घर कर गई।  उनकी प्रारंभिक शिक्षा केवल तीसरी कक्षा तक हुई थी।  स्वतंत्रता आंदोलन उन्हें ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों और बरगढ़ की अदालत में सरकारी विरोधी नारे लगाने की वजह से दो साल की जेल हुई, लेकिन नाबालिक होने की वजह से उन्हें छोड़ दिया। एक समाजसेविका भारत के आजाद होने के बाद 1950 में पार्वती ने अपनी बची हुई स्कूली शिक्षा  इलाहाबाद के प्रयाग महिला विद्यापीठ  से पूरी की। इसके बाद पार्वती 1954 में रमा देवी के साथ राहत कार्यों में भाग लेने लगी। 1955 में संबलपुर जिले में रहने वाले लोगों के स्वास्थ और स्वच्छता में सुधार करने के लिए अमेरिकी परियोजना से जुड़ी। इसके बाद पार्वती ने अनाथ बच्चों के लिए " ...

इंद्र देव ने घोड़े की चोरी क्यों की ?

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महाराज वेन देवताओं में विश्वास नहीं करते थे। इसलिए बहुत समझाने पर भी उन्होंने यज्ञ की अनुमति नहीं दी। जिसके बाद ऋषियों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया जिससे उनके पुत्र पृथु की उत्पत्ति हुई। जहाँ पश्चिम वाहिनी गंगा प्रवाहित होती है वहाँ ब्रह्मा और मनु का ब्रह्मवैवर्त क्षेत्र है। वहाँ राजा पृथु ने एक सौ अश्वमेध यज्ञ का आयोजन का निश्चय किया।  देवराज इंद्र को भय हुआ कि यदि ये यज्ञ संपन्न हो गया तो मेरा सिंहासन पर रहना संभव नहीं हो पाएगा।  इंद्र ने यज्ञ को भंग करने की योजना बनायी और जब पृथु का 100 वां यज्ञ हो रहा था तब इंद्र ने वेश बदल कर दान के लिए रखे, एक अश्व को चुरा लिया। तब पृथु के पुत्र ने इंद्र का पीछा किया और अश्व को वापस ले आए, लेकिन इंद्र ने फिर से अश्व को चुराने की कोशिश की। इससे क्रोधित होकर पृथु ने इंद्र को मारने के लिए धनुष उठा लिया तब ऋषियों ने उनसे कहा कि यदि आप बाण चलाएंगे तब देवराज के साथ पूरा देवलोक भी नष्ट हो जाएगा।  हम यज्ञ द्वारा ही इंद्र को बुलाकर इसी अग्नि में भस्म कर सकते है और उन्होंने ऐसा ही किया। लेकिन जैसे ही इंद्र अग्नि कुंड में प्रवेश करता ब्रह्मा ...

विश्व के सभी साँपों को मारने के लिए यज्ञ किसने किया ?

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महाभारत के वन पर्व में जनमेजय सर्प यज्ञ की कथा का वर्णन है। श्रृंगी ऋषि ने परीक्षित को श्राप दिया कि तक्षक नाग क्रोध करके अपने विष से सात दिन के भीतर ही जला देगा। ऋषि पुत्र के श्राप के कारण तक्षक नाग ने परीक्षित को काटा और उनकी मृत्यु हो गई।  परीक्षित ने अपनी मृत्यु से पहले शुकदेव जी से सात दिन तक भागवत कथा सुनी। उन्हें तो ऋषि पुत्र या नाग जाती से कोई द्वेष न था, उन्होंने तो यह समझा कि जैसे कर्म मैंने किया है, उसी के अनुरुप फल मुझे मिल गया है।  इसमें किसी दूसरे का दोष नहीं है लेकिन परीक्षित के पुत्र जनमेजय इस विचार धारा से सहमत नहीं थे। उन्होंने समस्त नाग जाति का समूल नाश करने के लिए सर्प यज्ञ करवाया। ऋषियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि इस यज्ञ के मंत्रों से विश्व के हर कोने से सर्पो को आकर्षित करके हवन कुंड में भस्म किया का जा सकता है। जनमेजय का तांत्रिक सर्प यज्ञ आरंभ हो गया, अभिचारिक कर्म के नियमों का पालन करते हुए ऋत्विक काले वस्त्र ग्रहण किए हुए थे, धुएं से उनके नेत्र रक्त वर्ण से हो रहे थे। अग्नि में विधि विधान के अनुसार आहुतियाँ दी जाने लगी उससे प्रभावित होकर सर्पों के मन ...

पांडवों को हजारों को भोजन कराने वाला पात्र किसने दिया ?

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💠महाभारत वन पर्व के अनुसार जब पांडवों को वनवास हुआ और वे वन में जाकर रहने की तैयारी करने लगे तब प्रेम वश नगर वासी उनके साथ जाकर रहने को तैयार थे।  💠तब उन्होंने अधिकांश प्रजा को समझा बुझा कर वापस भेज दिया,परन्तु शौनक आदि ब्राह्मण किसी भी प्रकार लौटने के लिए तैयार न हुए। 💠पांडव उनके भोजन की व्यवस्था कैसे करें, ये समस्या लेकर युधिष्ठिर धौम्य ऋषि के पास गए और कहा कि इतने लंबे समय तक इन सभी के भोजन की व्यवस्था कैसे हो पाएगी।  💠तब धौम्य ऋषि ने कहा कि जब - जब भी प्रजा पर अन्न संबंधी कष्ट आए है, उसे सूर्य भगवान की आराधना से दूर किया जा सका है। 💠धौम्य ऋषि ने युधिष्ठिर को मंत्र के साथ "सूर्याष्टोतरशतनाम स्त्रोत " का पाठ करने की प्रेरणा दी। ये स्त्रोत नृसिंह पुराण, अध्याय 20, स्कंद, कुमारि० ४२, ब्रह्मपुराण तथा महा०, वन० ३/१६ - २८ में वर्णित है।  💠युधिष्ठिर की उपासना से भगवान सूर्य प्रसन्न हुए और एक तांबें का परोसने वाला पात्र उन्हें दिया और कहा कि जब तक द्रौपदी स्वयं बिना खाए हुए इस पात्र से परोसती रहेगी, तब तक हजारों व्यक्तियों के लिए भी यह भोज्य पदार्थों का भंडार प्रस्तुत कर...

दुर्योधन ने दुर्वासा ऋषि से क्या माँगा ?

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⚜️महाभारत वन पर्व के अनुसार पांडव कौरवों से जुए में हारकर वनवास का जीवन जी रहे थे।  ⚜️अतिथियों को भोजन कराने की सुविधा के लिए सूर्य भगवान ने युधिष्ठिर को ऐसा पात्र दिया था जिससे द्रौपदी भोजन से पूर्व अपने समस्त अतिथियों को भर पेट भोजन करा सकती थी।  ⚜️एकबार महर्षि दुर्वासा दुर्योधन के यहाँ पधारे और दुर्योधन ने उनकी खूब सेवा की। दुर्योधन के आतिथ्य ग्रहण से वे बहुत प्रसन्न हुए। ⚜️तब दुर्योधन ने महर्षि दुर्वासा से यह निवेदन किया कि वन में आप हमारे भाई पांडवों का भी आतिथ्य ग्रहण करें,परन्तु  आप वहाँ जाय उस समय जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो। ⚜️महर्षि प्रसन्न थे इसी कारण उन्होंने दुर्योधन का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।  दुर्योधन यह भली भांति जनता था कि जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न कर लेगी तब तक सूर्य देव द्वारा प्रदत्त पात्र से वे हजारों अतिथियों को भी भोजन कराने में समर्थ हैं। ⚜️जब वह भोजन कर चुकी होगी और महर्षि वहाँ पहुंचेंगे तो उनके लिए भोजन की व्यवस्था करना असम्भव हो जायेगा। जिसके कारण महर्षि निश्चय रुप से उन्हें श्राप दे देंगे।  ⚜️कुछ समय बाद महर्षि दुर्वासा अपने 10,0...