नक्षत्रों की खोज भारत के किस ऋषि ने की ?
⚜️गर्ग मुनि नक्षत्रों के खोजकर्ता माने जाते हैं यानी सितारों की दुनिया के जानकार।
⚜️गर्ग मुनि सबसे प्राचीन खगोल विज्ञानी है। वे राजा परतु की मंत्री परिषद् के प्रमुख खगोल विज्ञानी थे।
⚜️गर्ग संहिता में कई धूमकेतुओं के बारे में बताया गया है।
⚜️उनकी पुस्तक में 16 धूमकेतुओं के बारे में उल्लेख मिलता है। वे कलीकेतु धूमकेतु और शंख धूमकेतु के 18 वर्ष 6 माह के अंतराल के बताते हैं।
⚜️इसी प्रकार अवरकेतु और में 3 साल और 6 माह का अंतराल बताते हैं।
⚜️गदाकेतु धूमकेतु मार्गशीर्ष अमावस्या (November - January), अद्रा (Betelgeuse), पुस्य (Asellus), पुनर्वसु (Pollux) , तारों के क्षेत्र के पास देखा जा सकता है।
⚜️कालकेतु पश्चिम से भ्रमतं (Near Vega) भ्रमहरिदयम (Aurgie) और ध्रुव (Pole star) तारे से होते हुए सप्तर्षि (Ursa major)की तरफ जाता है।
⚜️यह धूमकेतु संवर्तक और धूम धूमकेतु से 1000 वर्ष के अंतराल में दिखता है।
⚜️आचार्य इन दो धूमकेतुओं के विनाशकारी लक्षण जो पृथ्वी पर कारण होते हैं बताए है। इन दोनों के कारण धरती पर उल्कापिंड पर गिरते हैं, समुद्र में भूकंप पर्वतों को भी नुकसान पहुंचाते है। वे धूमकेतु को वैज्ञानिक कारण का पता लगाने में विश्वास रखते थे।
वेद पुराणों में गर्ग मुनि
⚜️गर्ग गोत्र का सबसे पहला और प्रमाणित उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद के मण्डल 6, सूक्त 47 के द्रष्टा गर्ग मुनि है।
⚜️जिन्हें गर्ग भारद्वाज के नाम से भी जाना जाता है। यह सूक्त इंद्र देव की स्तुति करता है।
⚜️गर्ग मुनि, ऋषि भारद्वाज के शिष्य थे और कुछ स्त्रोतों में उन्हें भारद्वाज ऋषि के पुत्र या पौत्र भी कहा गया है।
⚜️सभी चारों वेदों में, बृहदारण्यक उपनिषद, गर्ग संहिता की रचना की।
⚜️गर्ग मुनि का तपोस्थली दुनगिरी आश्रम था जो वर्तमान समय में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में है।
⚜️भागवत पुराण के अनुसार गर्ग मुनि ने नंदबाबा के यहाँ गोकुल में श्री कृष्ण का नामकरण किया था।
⚜️गर्ग मुनि अंगिरस वंश के ज्ञानी ऋषि थे, जो यदुवंश के गुरु और यदुवंश के ज्योतिषाचार्य के रुप में भी जाने जाते है।
⚜️ऋग्वेद में गर्ग नामक ऋषियों का उल्लेख गर्ग्य रुप में अधिक है। ये ऋषि यज्ञों और मंत्र रचना में निपुण थे।
⚜️यजुर्वेद और सामवेद में गर्ग वंशिय ऋषियों के अप्रत्यक्ष उल्लेख यज्ञ विधियों में मिलता है।
⚜️गृह्यसूत्र और गर्ग धर्म सूत्र वैदिक जीवन पद्धति के नियमकार थे।
⚜️गोत्र की मूल अवधारणा गायों की रक्षा और कुल एकता से प्रारंभ हुई किंतु कालांतर में यह ऋषि वंश और वैदिक परंपरा का प्रतीक बन गये।
खुदाई में मिले कुछ प्रमाण
⚜️कालीबंगा (2300 ईसा पूर्व) जैसे ऐतिहासिक यज्ञ स्थल गर्ग जैसे ऋषियों की परंपरा को दर्शाते है।
⚜️लोथल (2400 ईसा पूर्व) अग्नि वेदिकाएं गर्ग की यज्ञ परंपरा की पुष्टि करती हैं।
⚜️गर्ग मुनि वशिष्ठ की परम्परा के अग्निहोत्री ब्राह्मण थे।
⚜️मथुरा में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व गर्ग गोत्र के पुरोहितों के शिलालेख मिले।
⚜️प्रयाग प्रशस्ति 4 वीं शताब्दी में यज्ञ और पुरोहित परंपरा का उल्लेख मिलता है।
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